Before I became a poet, I was a listener.
कविताओं से मेरा रिश्ता उस उम्र में शुरू हुआ, जब शायद कविता का अर्थ भी पूरी तरह समझ में नहीं आता था। बचपन से कविताएँ सुनना अच्छा लगता था—उनके शब्द, उनकी लय, उनकी गूंज। धीरे-धीरे सुनते-सुनते शब्द मन में उतरते गए और फिर एक दिन उन्हीं शब्दों ने काग़ज़ पर जगह माँगनी शुरू कर दी। मैं किसान परिवार का बेटा मिट्टी से ज़रूर निकला हूँ, लेकिन साहित्य की उर्वर ज़मीन में भी उतना ही पला-बढ़ा हूँ। मेरे परिवार में साहित्य केवल पढ़ने की चीज़ नहीं, जीवन का हिस्सा रहा है। बड़े पापा राष्ट्रीय कवि श्री देवकृष्ण जी व्यास की कविताएँ पढ़ते और सुनते हुए बड़ा होना मेरे लिए कविता की पहली पाठशाला थी। उनके शब्दों से मैंने जाना कि कविता केवल कही नहीं जाती—वह भीतर उतरती है, जीवन को देखना सिखाती है और फिर किसी दिन आवाज़ बनकर बाहर आती है। लगभग तेरह वर्ष की उम्र में माँ के कहने पर मैंने अपनी पहली कविता लिखी। वह कविता शायद आज की नज़र से बहुत साधारण हो, लेकिन मेरे लिए वह असाधारण थी—क्योंकि वहीं से मेरे भीतर का कवि पहली बार काग़ज़ पर आया था। फिर आया 2016। सत्रह वर्ष की उम्र में पहली बार किसी कवि सम्मेलन के मंच पर खड़ा हुआ। हाथ में कविता थी, सामने श्रोता थे और भीतर एक अनकहा-सा डर भी। लेकिन उस मंच पर कविता पढ़ने के बाद लगा कि शायद यही वह जगह है, जहाँ मेरे शब्दों को अपना घर मिलना है। उस एक शाम से शुरू हुआ सफ़र आज एक दशक पूरा कर चुका है। इन दस वर्षों में मंच बदले, शहर बदले, श्रोता बदले। कविताएँ भी बदलीं। लेकिन एक चीज़ नहीं बदली—शब्दों से मेरा प्रेम। आज भी, हर बार मंच पर जाने से पहले, मैं उसी तेरह साल के लड़के में लौट जाता हूँ— जो पहली बार कुछ शब्द लिखकर बैठा था।
A decade later, I am still listening.
Still writing.
Still searching for the right words.
Because poetry, for me, was never just something I wrote.
It became something I became.




















